यह अनुवाद अंग्रेज़ी के मूल लेख West Bengal’s BJP government seeks to stamp Hindu-supremacist rule on India’s fourth largest state का है, जो 29 मई को प्रकाशित हुआ था।
पश्चिम बंगाल की नई चुनी गई बीजेपी सरकार, भारत के चौथे सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य पर हिंदू वर्चस्ववादी शासन थोपने की बहुत तेज़ी से कोशिश कर रही है।
इसके आदेश पर 15 मई, शुक्रवार को कोलकाता में एक मुस्लिम बहुल इलाक़े में सड़क पर जुमे की नमाज करने से पुलिस ने मुसलमानों को रोक दिया। जबकि ये लोग परम्परागत रूप से दशकों से सड़क किनारे जुमे की नमाज़ पढ़ते आए हैं।
इसके दो दिन बाद ही पुलिस ने पार्क सर्कस सेवन-प्वाइंट के पास इकट्ठा हुए प्रदर्शनकारयों पर बुरी तरह हमला बोला। ये लोग सार्वजनिक प्रार्थना पर पुलिस द्वारा लगाए गए नए प्रतिबंधों और 'शहरी नवीनीकरण' के नाम पर 'अनधिकृत' ढांचों पर बुलडोज़र चलाने के सरकारी अभियान का विरोध करने के लिए इकट्ठा हुए थे। वास्तव में ये ढांचे अस्थायी घर और भोजन एवं अन्य दुकानें हैं, जिन्हें ग़रीब लोगों ने इसलिए बनाया क्योंकि सरकार की ओर से उन्हें कोई मदद मिली ही नहीं और ना ही शहरी आधारभूत ढांचे और योजना में उन्हें कोई जगह दी गई।
पुलिस ने कई बार लाठी चार्ज किया और कम से कम 46 लोगों को हिरासत में लेकर मुकदमे दर्ज किए।
ये घटनाएं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की धुर दक्षिणपंथी बीजेपी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार की ओर से भड़काऊ और हिंदू साम्प्रदायिक उकसावेबाज़ी के व्यापक अभियान का हिस्सा हैं। इस अभियान का मक़सद, मज़दूर वर्ग को बांटना, बीजेपी के धुर दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं को लामबंद करना और सरकारी दमन को वैध ठहराना है।
ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका-इसराइल के फैलते युद्ध की वजह से जैसे जैसे भारत में आर्थिक संकट गहरा रहा है, बीजेपी की साम्प्रदायिक आक्रामकता बहुत तेज़ी से बढ़ी है। ध्यान रखने वाली बात है कि ईरान के ख़िलाफ़ जंग में नई दिल्ली, वॉशिंगटन और इसराइल के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी के माध्यम से पूरी तरह शामिल है।
महीने के शुरू में, मोदी ने कहा कि भारत के मज़दूर और ग्रामीण महेनतकश आबादी को, जंग की वजह से पैदा हुए आर्थिक संकट से निपटने के लिए 'त्याग' करना होगा। गुजरात में बोलते हुए उन्होंने 'राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी' के नाम पर जनता से ईंधन और उर्वरकों की ख़पत कम करने, आयात को कम करने, विदेशी यात्राएं फ़िलहाल टालने और सार्वजनिक ख़र्च कटौती के उपायों को स्वीकार करने की अपील की।
मोदी की अपील के पीछे सोच थी, कि आर्थिक संकट का सारा बोझ किसानों, मज़दूरों और ग़रीबों पर डाल दिया जाए, जबकि कारपोरेट के प्राफ़िट और भारत के वित्तीय अभिजात लोगों की संपत्ति पर आंच न आने दी जाए।
बीजेपी जानती है कि आम लोगों के जीवन यापन पर ये हमले, मज़दूरों और नौजवानों के विस्फोटक विरोध को जन्म देंगे। अप्रैल में लाखों वर्कर, स्वतः स्फूर्त हड़तालों में शामिल हो गए थे। ये प्रदर्शन पॉवर्टी वेजेज़ (ग़रीबी के स्तर की मज़दूरी) और कारखानों में काम के बुरे हालात के विरोध में हुए थे। ये प्रदर्शन भारत की राजधानी और सबसे बड़े शहरी समूह वाले दिल्ली के आसपास स्थित औद्योगिक क्षेत्रों में भड़का।
जैसा होता है, मज़दूर वर्ग के बढ़ते विरोध के जवाब में मोदी सरकार की जो प्रतिक्रिया होती है, वही हुई, यानी, सरकारी दमन का सहारा लिया गया। उत्तर प्रदेश के नोएडा और हरियाणा के मानेसर में हुए प्रदर्शनों में शामिल रहे सैकड़ों वर्करों को गिरफ़्तार किया गया और फ़र्जी मामले लाद कर जेल भेज दिया गया और सांप्रदायिक उकसावेबाज़ी को और तेज़ कर दिया गया।
पश्चिम बंगाल में जो हो रहा है, यह उसी की बानगी है।
राज्य में पहली बार सत्ता में आने के तुरंत बाद, बीजेपी सरकार ने अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाना, सांप्रदायिक उकसावेबाज़ी और पुलिसिया दमन की शुरुआत कर दी। कोलकाता में तिलजाला, सियाल्दह और हावड़ा स्टेशन के इलाक़ों में बुलडोज़र तैनात कर दिए गए, सड़क के किनारे की इमारतों, रेहड़ी पटरी वालों और ग़रीबों की झुग्गियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया गया।
इन हमलों को, आधिकारिक रूप से अतिक्रमण विरोधी अभियानों का जुमला पहनाया गया। वास्तविकता में, ये ग़रीबों पर युद्ध छेड़ने जैसा हैं। डिमोलिशन (घर ढहाने) अभियान ने दसियों हज़ार रेहड़ी पटरी दुकानदारों, दिहाड़ी कमाने वालों, छोटे व्यापारियों, असंगठित क्षेत्र के वर्करों की आजीविका पर ख़तरा पैदा कर दिया है। इनमें हिंदू और मुस्लिम दोनों हैं।
हाल के चुनावों में हार गईं राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी समेत विपक्षी नेताओं ने बीजेपी की 'बुलडोज़र संस्कृति' की निंदा की है और चेतावनी दी है कि 'बुलडोज़र सरकार चलाने की भाषा नहीं बन सकता।'
कोलकाता से आने वाली रिपोर्टों से पता चलता है कि बीजेपी सरकार द्वारा परिवहन केंद्रों और मज़दूर वर्ग के इलाक़ों के आसपास चलाए जा रहे शहरी 'सफ़ाई अभियान' से 1,00,000 से अधिक फेरीवालों और सड़क किनारे छोटे व्यापारियों को बेदख़ली का सामना करना पड़ सकता है। इन हमलों का सबसे ज़्यादा असर धर्म या जाति की परवाह किए बिना आबादी के सबसे ग़रीब तबके पर पड़ता है।
हालांकि, बीजेपी के ये दमनकारी अभियान, मज़दूर वर्ग के व्यापक तबके पर पड़ा है, लेकिन सरकार ने जानबूझ कर अपनी कार्रवाईयों को साम्प्रदायिक रंग दिया ताकि हिंदू वर्चस्ववादी भावना को और भड़काया जा सके।
यह उसी ढर्रे को आगे बढ़ाता है, जिसे उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व ने नियम सा बना दिया है, जहां 'बुलडोज़र जस्टिस' मुसलमानों के ख़िलाफ़ सामूहिक दंड का दूसरा नाम बन गया है। इसी तरह के तरीक़े भारत प्रशासित कश्मीर में भी अपनाए गए हैं। अगस्त 2019 में मोदी सरकार ने एक संवैधानिक तख़्तापलट करते हुए मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा समाप्त कर दिया था। इसके बाद विरोध को कुचलने के लिए डिमोलिशन, सामूहिक हिरासत और सैन्य दमन का इस्तेमाल किया गया।
बीजेपी लंबे समय से गोहत्या और मंदिर राजनीति से जुड़े हिंदू सांप्रदायिक मुहिमों को शह देती रही है, ताकि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को और मज़बूत किया जा सके और हिंदुत्व के कट्टर राष्ट्रवाद को हवा दी जा सके।
गुजरात में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) और बजरंग दल से जुड़े गोरक्षा विजिलांते समूहों (निगरानी ग्रुपों) ने मवेशियों के लाने ले जाने या गोमांस खाने का आरोप लगाकर बार-बार मुसलमानों और दलितों को निशाना बनाया।
हाल ही में गुजरात के सोमनाथ मंदिर के आस पास फैले सांप्रदायिक तनाव ने फिर से यह दिखाया है कि किस तरह 'अतिक्रमण विरोधी' अभियान और डिमोलिशन कार्रवाइयों का इस्तेमाल मुस्लिम विरोधी भावनाओं को भड़काने के लिए किया जाता है। रिपोर्टों में सांप्रदायिक तनाव के बीच धार्मिक ढांचों और उनके आसपास की बस्तियों में बड़े पैमाने पर बुलडोज़र कार्रवाई का ज़िक्र किया गया है।
संयोग नहीं है कि जिस दिन मोदी ने 'राष्ट्रीय एकता' के नाम पर आर्थिक 'त्याग' करने की अपील करते हुए भाषण दिया, उसी दिन उन्होंने सोमनाथ मंदिर का दौरा भी किया। मोदी उस समिति के प्रमुख हैं, जिसे मंदिर के जीर्णोद्धार की निगरानी की ज़िम्मेदारी दी गई है। दरअसल वह और उनकी सरकार इसे एक हिंदू राष्ट्रवादी तीर्थस्थल के रूप में स्थापित करने के लिए इसका खूब प्रचार प्रसार कर रही है। दावा किया जाता है कि अयोध्या में ध्वस्त की गई बाबरी मस्जिद की जगह बने मंदिर के बाद यह दूसरा महत्वपूर्ण मंदिर है।
इन्हीं राजनीतिक तरीक़ों का इस्तेमाल अब पश्चिम बंगाल में भी किया जा रहा है। बजरंग दल कार्यकर्ताओं के गोहत्या विरोधी आंदोलन ने पूरे राज्य में गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने वाले 1950 के एक प्रतिक्रियावादी क़ानून को लागू करने की मांग की थी और राज्य सरकार ने भी इसे सख़्ती से लागू करने की बात कही है।
प्रदेश में बीजेपी, बांग्लादेश विरोधी कट्टर राष्ट्रवाद को आक्रामक रूप से उकसा रही है। ग़रीब प्रवासियों को 'घुसपैठया' बताकर उन्हें बेरोज़गारी और सामाजिक समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है। यह ज़हरीला अभियान लोगों के ग़ुस्से को पूंजीवाद से हटाकर ग़रीब मज़दूरों को एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ा करने की कोशिश करता है।
कोलकाता में हुए सांप्रदायिक हमलों के साथ-साथ मांस की दुकानों और मुसलमानों के कारोबारों पर भी हमले हुए। यह घटनाएं बीजेपी की चुनावी जीत के बाद सामने आईं।
दूसरी तरफ़ पश्चिम बंगाल के मज़दूर बढ़ती बेरोज़गारी, महंगाई, निजीकरण और मज़दूर अधिकारों पर हमलों से जूझ रहे हैं। राज्य की बीजेपी सरकार, मोदी की केंद्र सरकार की ओर से लाए गए मज़दूर विरोधी श्रम क़ानूनों को तेज़ी से लागू करने की दिशा में बढ़ रही है। इन क़ानूनों ने वेतन, नौकरी की सुरक्षा और कामकाजी हालात से जुड़ी क़ानूनी सुरक्षा को और कमज़ोर कर दिया है।
पश्चिम बंगाल में उभर रहा विस्फोटक सामाजिक तनाव, भारतीय पूंजीवाद के सामने खड़े व्यापक संकट का हिस्सा है।
भारत की अर्थव्यवस्था पर, बढ़ती ईंधन क़ीमतों, उर्वरक की कमी और ईरान पर अमेरिका-इसराइल जंग से जुड़ी वैश्विक अस्थिरता का दबाव बढ़ रहा है। मोदी सरकार पहले ही ईंधन की क़ीमतें बढ़ा चुकी है और व्यापक सार्वजनिक खर्च कटौती को लागू करने की तैयारी कर रही है।
बीजेपी को डर है कि मज़दूर वर्ग का व्यापक विरोध फूट सकता है। उसका जवाब सांप्रदायिक उकसावेबाज़ी, राष्ट्रवाद और पुलिसिया दमन है।
लेकिन विपक्षी दलों की ओर से कोई प्रगतिशील विकल्प पेश नहीं किया जा रहा है।
तृणमूल कांग्रेस भले ही अब बीजेपी की 'बुलडोज़र संस्कृति' की आलोचना कर रही है, लेकिन वह खुद एक बुर्जुआ क्षेत्रीय पार्टी है, जिसने सत्ता में रहते हुए बंगाली अस्मितावाद और सांप्रदायिक तुष्टिकरण की राजनीति को बढ़ावा दिया। उसने इमामों के लिए भत्तों और आरक्षण जैसे उपायों के ज़रिए मुसलमानों के बीच चुनावी आधार बनाने की कोशिश की, जबकि पूंजीवादी व्यवस्था का मज़बूती से बचाव किया और मज़दूरों एवं किसानों के स्वतंत्र आंदोलनों को दबाया।
कांग्रेस पार्टी और स्टालिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम भी बीजेपी के उभार की परिस्थितियां पैदा करने के लिए उतने ही बड़े ज़िम्मेदार हैं।
दशकों तक स्टालिनवादियों ने मज़दूर वर्ग को कांग्रेस और अन्य पूंजीवादी दलों के साथ बने गठबंधनों का पिछलग्गू बनाए रखा। साथ ही उन्होंने पश्चिम बंगाल में निवेशक परस्त वाम मोर्चा सरकारें चलाईं, जिन्होंने निजीकरण और सार्वजनिक खर्च कटौती को बढ़ावा दिया, और मज़दूरों और किसानों पर तरह तरह के हमले किए।
मज़दूरों को 'सेक्युलर' कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधनों में बांधकर, स्टालिनवादियों ने बीजेपी के उभार का रास्ता तैयार किया। दरअसल कांग्रेस बड़े कारोबारियों की पार्टी रही है जिसने भारत को नवउदारवादी, बाज़ार परस्त नीतियों की ओर धकेला और जिसने अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ भारत की चीन विरोधी 'वैश्विक रणनीतक साझेदारी' की बुनियाद रखी।
पश्चिम बंगाल की घटनाएं दिखाती हैं कि सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ संघर्ष को पूंजीवाद, सार्वजनिक खर्च कटौती और साम्राज्यवादी युद्ध के ख़िलाफ़ संघर्ष से अलग नहीं किया जा सकता।
बीजेपी के सांप्रदायिक हमलों का मक़सद आर्थिक संकट और युद्ध का बोझ मज़दूरों और ग्रामीण ग़रीबों पर डालने के लिए परिस्थितियां तैयार करना है। जबकि बुनियादी राजनीतिक कार्य एक स्वतंत्र समाजवादी आंदोलन का निर्माण करना है, जो हिंदू, मुस्लिम और अन्य सभी मज़दूरों को सांप्रदायिकता, पूंजीवादी शोषण और साम्राज्यवादी युद्ध के ख़िलाफ़ एकजुट करे।
