यह अनुवाद अंग्रेज़ी के मूल लेख The criminalization of the Noida worker protests: How India’s authorities are seeking to stamp out worker opposition through state repression का है जो 4 जून 2026 को प्रकाशित हुआ था।
भारत की राजधानी और सबसे बड़े शहरी औद्योगिक हब दिल्ली के चारो ओर स्थित औद्योगिक उपनगरों में हरियाणा में मानेसर से लेकर उत्तर प्रदेश के नोएडा औद्योगिक क्षेत्र तक, दसियों हज़ार वर्करों ने अप्रैल में हड़ताल कर दी थी। उनकी मांगें बहुत बुनियादी थीं, 12-14 घंटे ड्यूटी कराने पर रोक लगे, कारखानों के अंदर सम्मानजक काम करने का अधिकार हो और डबल ओवरटाइम पेमेंट का निमय लागू हो, जिसे कि भारत के कारपोरेट लगातार नज़रअंदाज़ करते रहे हैं। लेकिन इस पूरी वैध मांग और संविधान में सुरक्षित प्रदर्शन के अधिकार के प्रति सत्ताधारी धुर दक्षिणपंथी बीजेपी की अगुवाई वाली भारत सरकार की प्रतिक्रिया बातचीत वाली नहीं थी। इसकी जगह सामूहिक गिरफ़्तारियां हुईं, टॉर्चर किए गए, प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतयाती गिरफ़्तारी) किया गया और औपनिवेशिक ज़माने के एनएसए यानी राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून 1980 को लादा गया, जिसे इसीलिए बनाया गया था कि बिना सुनवाई के ही लोगों को लंबे समय तक जेल में बंद रखा जाए।
लगभग दो महीने हो चुके हैं, सैकड़ों वर्कर हिंसा के फर्जी मामलों और अशांति फैलाने के आरोपों में जेल में बंद हैं। प्रशासन ने मनमाने तरीक़े से वामपंथी सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी गिरफ़्तार कर लिया है, जिन्होंने मज़दूरों के प्रदर्शन का समर्थन किया और उनकी बातों का प्रचार प्रसार किया। उनमें से लगभग आधा दर्जन कार्यकर्ताओं को एनएसए के तहत बिना आरोप पत्र के जेल में बंद करके रखा गया है।
अगर प्रशासन ने प्रदर्शन को दबाने और मज़दूरों को सबक सिखाने के लिए इतने आक्रामक ढंग से कार्रवाई की तो इसलिए कि यह प्रदर्शन आंदोलन पूरी तरह आधिकारिक ट्रेड यूनियनों के दायरे के बाहर फूटा। इन आधिकारिक यूनियनों में स्टालिनवादी यूनियनें भी हैं जैसे सेंटर ऑफ़ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) और ऑल इंडिया ट्रेड यूनियंस कांग्रेस (एटक), जिन्होंने वर्ग संघर्ष को दशकों तक दबाने का काम किया है।
शुरुआत से ही, प्रशासन ने मज़दूरों के बग़ावत को आनन फानन में 'क़ानून-व्यवस्था' की समस्या के रूप में पेश करने की कोशिश की। पूरे इतिहास में जब भी मज़दूरों का जुझारू आंदोलन उभरता है, तो हर सत्ताधारी वर्ग की यह एक जानी पहचानी रणनीति होती है। उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस की ओर से जो कहानी गढ़ी गई और जिसे कारपोरेट मीडिया ने बड़ी वफ़ादारी से फैलाया कि इस प्रदर्शन के पीछे, भारत के धुर प्रतिद्वंद्वी दुश्मन पाकिस्तान और नक्सली विद्रोहयों (माओवादियों) के साथ कनेक्शन रखने वाले कुछ शातिर 'बाहरी तत्वों' की साज़िश थी। उन्होंने प्रदर्शन भड़काया और उनका इस्तेमाल करते हुए हिंसा रची। इन आरोपों का मक़सद बिल्कुल साफ़ थाः संघर्ष को अपने आप में अपराध बनाना, जनता की सहानुभूति से वर्करों को अलग थलग करना और हर उस व्यक्ति को डराना जो वर्करों के साथ खड़ा होने की सोच रहा हो।
वर्दीधारी उकसावेबाज़
13 अप्रैल को नोएडा में भड़की हिंसा, मज़दूरों की ओर से की गई कार्रवाई की वजह से स्वतःस्फूर्त नहीं थी। जैसा की डब्ल्यूएसडब्ल्यूएस ने पहले भी रिपोर्ट किया था, पुलिस ने इकट्ठा हुए मज़दूरों पर हमला बोला, लाठियों से उन्हें पीटा गया और पकड़े गए लोगों को सड़कों पर घसीटा गया। इस हमले के बाद ही वर्करों ने प्रतिक्रिया दी और उन्होंने पुलिस पर पत्थर फेंके और कुछ पुलिस वाहनों को आग के हवाले कर दिया। यह एक ऐसी प्रतिक्रिया थी जिसे कोई भी ईमानदार प्रेक्षक आत्मरक्षा मानेगा। दिलचस्प है कि अन्य गाड़ियों को जिन लोगों ने आग के हवाले किया, वे 'सुविधानजक रूप से अभी भी अज्ञात हैं।'
यह कहानी भारत के औद्योगिक इलाक़ों में कोई नई नहीं है। मज़दूरों और उनके अधिकारों की रक्षा करने वालों ने बहुत अच्छी तरह से इसका दस्तावेज़ीकरण किया है कि कैसे मैनेजमेंट हिंसा फैलाने के लिए वर्करों के भेष में अपने गुंडों को तैनात करता है, ताकि बर्बर पुलिसिया तांडव के लिए बहाना बनाया जा सके। सबसे घिनौना उदाहरण मानेसर स्थित मारुति सुज़ुकी असेंबली प्लांट में देखने को मिला, जहां जुलाई 2012 में मैनेजमेंट की ओर से कारखाने में उकसाए गए झगड़े के बीच रहस्यमयी आग लग गई। हरियाणा की तत्कालीन कांग्रेस पार्टी की राज्य सरकार के पूर्ण समर्थन से, पुलिस ने बाद में 13 मज़दूरों पर झूठे हत्या के आरोप लगाकर मुक़दमा चलाया, जिनमें मारुति सुज़ुकी वर्कर्स यूनियन के सभी 12 नेता शामिल थे। मारुति सुज़ुकी वर्कर्स यूनियन एक नवगठित स्वतंत्र यूनियन थी जिसने ठेका मज़दूरों की स्थिति में सुधार के लिए एक जुझारू संघर्ष छेड़ा था। पांच साल की बिना सुनवाई के कैद और साफ़ तौर पर धांधली वाले मुकदमे के बाद, उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। वही पैटर्न, यानी उकसाना, झूठे आरोप लगाना, सामूहिक कारावास, आज भी अपने अधिकारों की मांग कर रही मज़दूरों की नई पीढ़ी के ख़िलाफ़ लागू किया जा रहा है।
नोएडा में हुए विरोध प्रदर्शनों से पहले गुरुग्राम-मानेसर औद्योगिक क्षेत्र में मज़दूरों का उग्र आंदोलन हुआ था, जिसने कुछ हद तक इन आंदोलनों को जन्म भी दिया था। हरियाणा की बीजेपी सरकार ने पुलिसिया दमन और देर से मिलने वाली, मामूली न्यूनतम वेतन वृद्धि के मिले जुले उपाय से इस आंदोलन को दबाने का प्रयास किया।
मानेसर आईएमटी के सेक्टर-7 में रिचा ग्लोलबल एक्सपोर्ट्स फ़ैक्ट्री है। वहां 9 अप्रैल को वर्करों ने मज़दूरी को लेकर हड़ताल की थी। हालांकि इससे पहले कई दिनों से यह आंदोलन शांतिपूर्ण तरीक़े से चल रहा था, लेकिन यह 9 तारीख़ को हिंसक हो गया, या यूं कहें कि मैनेजमेंट और पुलिस ने हिंसक हो जाने का दावा कया।
बचाव पक्ष के वकील ने डब्ल्यूएसडब्ल्यूएस से जो दस्तावेज़ साझा किए हैं, उसके अनुसार, गुरुग्राम के अतिरिक्त सत्र न्यायालय में जो अदलाती दस्तावेज़ जमा किए गए उसमें उत्तर प्रदेश के 20 साल के एक वर्कर विजयेंद्र के ख़िलाफ़ अभियोजन पक्ष की दलीलों का खुलासा होता है। वह वर्कर एक गार्मेंट फ़ैक्ट्री में काम करता है। वह उन एक दर्जन से भी ज़्यादा मज़दूरों में शामिल है जिन पर 'दंगे' में शामिल होने का आरोप लगाया गया है। उन पर आरोप है कि उन्होंने कंपनी की मशीनों को नुकसान पहुंचाया, कंपनी और पुलिस की गाड़ियों में आग लगाई और मैनेजमेंट के लोगों पर हमला बोला। एफ़आईआर में उन पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की लगभग एक दर्जन धाराएं लगाई गई हैं। बीएनएस को दरअसल नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भारत की बीजेपी सरकार ने 2023 में पास किया था। उस वर्कर को ज़मानत देने से इनकार कर दिया गया।
विजयेंद्र अकेले नहीं हैं। मानेसर और नोएडा के सैकड़ों वर्करों पर एक जैसी ही धाराएं लगाई गईं। भारी संख्या में सामूहक गिरफ़्तारियां की गईं, जिनका मक़सद डराना धमकाना था। ऐसे मामलों में जहां कोर्ट ने माना कि ज़मानत दी जा सकती है, उन वर्करों पर भारी गारंटी देने को कहा गया जोकि उन वर्करों की तनख्वाह के बराबर थी या उससे भी अधिक थी। और इस तरह ज़मानत मिलने के बाद भी वर्करों और उनके परिजनों के लिए रिहाई को मुश्किल बना दिया गया।
पाकिस्तान, साज़िश और सबसे बड़ा झूठ
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नोएडा में मज़दूरों के विरोध प्रदर्शनों पर पुलिस की क्रूर कार्रवाई को छिपाने के लिए झूठ का अभियान चलाया। उन्होंने खुद मज़दूरों के विरोध प्रदर्शनों को 'संगठित साज़िश' करार दिया और 'पाकिस्तान कनेक्शन' का भड़काऊ, सांप्रदायिक आरोप लगाया। नोएडा पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने भी बिना किसी सबूत के इस बात को पुख्ता करते हुए दावा किया कि हिंसा 'दुर्भावनापूर्ण, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित गतिविधि' थी। यही भाषा हर जगह सत्तावादी सरकारों की होती है: जब मज़दूर संगठित होते हैं, तो उन पर विदेशी साज़िश का आरोप लगाओ। जब यह विफल हो जाता है, तो राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला दो।
आदित्यनाथ सरकार ने बिल्कुल यही किया, मज़दूरों के प्रदर्शन का समर्थन करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं पर एनएसए थोपा।
ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियातन नज़रबंदी) क़ानून की तरह ऐसा किया गया। इसके अलावा एनएसए लगाया गया जो प्रशासन को बिना किसी आरोप या मुकदमे के लोगों को 12 महीने तक कैद में रखने की अनुमति देता है। यह सरकारी आतंक का एक हथियार है और अब इसका इस्तेमाल उन मज़दूर अधिकार कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ किया जा रहा है जिनका 'अपराध' केवल इतना था कि उन्होंने अपने द्वारा देखी गई घटनाओं को दर्ज किया और उनके बारे में बोला।
गिरफ़्तार किए गए और जिन पर एनएसए लागू किया गया, उनमें शामिल हैं- आदित्य आनंद, एक बेरोज़गार सॉफ्टवेयर इंजीनियर, जो मज़दूर बिगुल नामक एक मज़दूर अधिकार ग्रुप से जुड़े हैं; रूपेश रॉय, एक ऑटो-रिक्शा चालक और मज़दूर अधिकार कार्यकर्ता हैं; मनीषा चौहान, खुद एक मज़दूर हैं; हिमांशु ठाकुर, एक छात्र हैं; सत्यम वर्मा, एक पत्रकार, अनुवादक और लेखक हैं; और आकृति चौधरी, एक थिएटर कलाकार हैं।
टॉर्चर, मनगढ़ंत सबूत और एक आज्ञाकारी सुप्रीम कोर्ट
रूपेश रॉय के परिवार और वकीलों ने 25 अप्रैल को दिल चाक कर देने वाला प्रेस बयान जारी किया, जिसमें विस्तार से बताया गया कि पुलिस हिरासत में इन कार्यकर्ताओं के साथ क्या हुआ। उनका आरोप है कि उन्हें 'हिरासत में बेरहमी से हिंसा का शिकार बनाया गया और लगातार शारीरिक और मानसिक टॉर्चर' किया गया। सबसे गंभीर आरोप यह है कि रॉय ने बताया कि उन्हें नोएडा के एनएसईज़ेड के विरोध वाली जगह पर ले जाया गया, जबकि वह पहले ही 36 घंटे से अधिक समय से हिरासत में थे। यानी वह 13 अप्रैल की घटनाओं में किसी भी तरह शामिल नहीं हो सकते थे। वहां पुलिस ने मिट्टी के तेल की बोतलें और मशाल की लकड़ियां रखीं और फिर उन्हें उठाने के लिए मजबूर किया, जबकि उनकी वीडियो रिकॉर्डिंग की गई। रॉय ने कहा, 'मुझे झाड़ियों के पीछे एक जगह ले जाया गया, जहां मिट्टी के तेल की बोतलें और मशाल की लकड़ियां रखी गई थीं। पुलिस ने मुझे इन मशालों और मिट्टी के तेल की बोतलों को उठाने के लिए मजबूर किया, उस दौरान वे मेरी वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे थे।'
आदित्य आनंद, जिन्हें पुलिस ने 13 अप्रैल की हिंसा का 'मास्टरमाइंड' बताया है, उन्हें तमिलनाडु से उत्तर प्रदेश पुलिस ने अवैध रूप से गिरफ़्तार किया और उत्तर प्रदेश ले गई। ऐसा तब हुआ जब तमिलनाडु की एक स्थानीय मजिस्ट्रेट अदालत ने ट्रांज़िट रिमांड देने से इनकार कर दिया था, जिससे उनकी गिरफ़्तारी स्पष्ट रूप से अवैध हो गई। इसके बावजूद जब मामला भारत के सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तब न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने आदित्य और रूपेश से उनकी यातना के बारे में उनके मुंह से सुनने के बाद भी, और जबकि न्यायमूर्ति भुइयां ने खुद माना कि 'अभियुक्त के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए', उन्हें एनएसए के अलोकतांत्रिक प्रावधानों के तहत न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने कहा, 'क़ानून को अपना काम करने देना होगा।'
अदालत को यह भी बताया गया कि पुलिस ने उसी व्हाट्सऐप समूह में घुसपैठ की थी, जिसे अब वह साज़िश के सबूत के रूप में पेश कर रही है। इसका मतलब है कि राज्य के एजेंट उन 'भड़काऊ' संदेशों में शामिल रहे हो सकते हैं या संभव है कि उन्होंने ख़ुद वे संदेश लिखे हों, जिनका इस्तेमाल इन गिरफ़्तारियों को सही ठहराने के लिए किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस खुलासे को उस गंभीरता के साथ नहीं लिया जिसकी उससे उम्मीद थी।
मानेसर मामले में, विजयेंद्र के ख़िलाफ़ अभियोजन पक्ष की दलील का बड़ा हिस्सा उन व्हाट्सऐप संदेशों पर आधारित है जो उनके नाम पर दर्ज एक फ़ोन से भेजे गए थे। उनके वकीलों ने तर्क दिया कि ये संदेश उस साझा कमरे में रहने वाले किसी भी व्यक्ति ने भेजे हो सकते थे, जहां कई लोग रहते हैं। अदालत ने ज़मानत के दौरान इस दलील को ख़ारिज कर दिया और 'प्रथम दृष्टया' सबूतों को 20 वर्षीय मज़दूर को जेल में बंद रखने के लिए पर्याप्त माना।
गौरतलब है कि अदालत ने खुद एक टिप्पणी की और अनजाने में ईमानदारी से यह निकल गया कि 'जब भी आंदोलन चरम पर होता है, प्रदर्शनकारियों की हिंसक घटनाओं ने हमेशा ही आंदोलन को कमज़ोर किया है।'
सस्ते श्रम का स्वर्ग, जिसे ताक़त के बल पर बनाए रखा गया
इस पूरी कहानी की हर कड़ी को जोड़ने वाली बात 'पूंजी का तर्क' है। चाहे मानेसर और नोएडा में सामूहिक गिरफ़्तारियां हों, एनएसए के तहत हिरासत हो, टॉर्चर हो, गढ़े गए सबूत और ज़मानत से इनकार किया जाना हो। भारत का सत्ताधारी शासक वर्ग, उसकी बीजेपी सरकार, अलग-अलग दलों की राज्य सरकारें और न्यायपालिका एक सामूहिक निर्णय पर पहुंच चुकी हैं कि वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था में देश की सबसे बड़ी ताक़त उसकी बड़ी संख्या में मौजूद बेहद ग़रीब और राजनीतिक रूप से दबाई गई श्रमशक्ति (मज़दूर) है। हर महीने 11,000 रुपये (115 अमेरिकी डॉलर) कमाने वाले वे मज़दूर, जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक सामान और ऑटो पुर्ज़े बनाते हैं, विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने की भारत की रणनीति की बुनियाद हैं। इस व्यवस्था में किसी भी तरह का व्यवधान चाहे वह सफल वेतन वृद्धि की मांग हो, ज़मीनी स्तर का कोई आंदोलन या स्वतंत्र यूनियन हो या मज़दूरों का कोई जुझारू आंदोलन, उसे फैलने से पहले ही कुचल देना ज़रूरी समझा जाता है।
केंद्र और राज्य सरकारों, पुलिस और अदालतों के गठजोड़ ने घरेलू और बहुराष्ट्रीय पूंजी, दोनों के लिए भारत को सस्ते श्रम का स्वर्ग बनाए रखने का एक सुनियोजित और समझबूझ कर फ़ैसला किया है। इस काम में उन्हें कॉरपोरेट मीडिया और सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त यूनियनों का भी पूरा सहयोग मिलता है, जो लगातार मज़दूरों के संघर्षों को अलग-थलग रखती हैं और उन्हें राज्य द्वारा बनाई गई, मालिक परस्त सामूहिक वार्ता (कलेक्टव बार्गेनिंग) व्यवस्था तक सीमित रखती हैं। जिस तरह उन्होंने फंसाए गए मारुति सुज़ुकी मज़दूरों की रक्षा के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया, क्योंकि इससे कांग्रेस पार्टी और पूरे राजनीतिक प्रतिष्ठान के साथ उनके दोस्ताना संबंध प्रभावित हो सकते थे, उसी तरह सीटू और एटक ने भी नोएडा और मानेसर के मज़दूरों और जेल में बंद वामपंथी और सामाजिक कार्यकर्ताओं के समर्थन में देशभर के मज़दूरों को संगठित करने के लिए कोई अभियान नहीं चलाया।
मज़दूर वर्ग के पास इसका केवल एक जवाब है। उसे उनके बचाव की ज़िम्मेदारी उठानी होगी और इसे मज़दूर वर्ग के संघर्ष के नए स्वतंत्र संगठनों यानी ज़मीनी स्तर की कमेटियों के निर्माण के संघर्ष का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा। ऐसी कमेटियां जो मज़दूर अधिकारों को पूंजीवादी मुनाफ़े के अधीन करने को स्वीकार करने से मना कर दें और समाजवादी कार्यक्रम के आधार पर दुनिया भर के मज़दूरों की एकता के लिए संघर्ष करें।
