यह हिंदी अनुवाद अंग्रेज़ी के मूल Comrade K.S. Ganeshadev (1939–2026): A fighter for Trotskyism का है जो 15 जुलाई 2026 को प्रकाशित हुआ था।
रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट लीग (आरसीएल) और इसके बाद बनी, चौथे इंटरनेशल की इंटरनेशनल कमेटी (आईसीएफ़आई) की श्रीलंकाई इकाई सोशलिस्ट इक्वालिटी पार्टी (एसईपी) के लंबे समय से सदस्य रहे कॉमरेड के.एस. गणेशदेव का 22 मार्च 2026 को 87 साल की उम्र में निधन हो गया था।
डायबिटीज़ से जुड़ी लंबे समय से चली आ रही स्वास्थ्य समस्याओं के कारण, तमिलनाडु राज्य की राजधानी चेन्नई के एक अस्पताल में उनका निधन हुआ। उनके परिवार में तीन बच्चे- रोज़ा, लियोन और कीर्ति और दो छोटे भाई हैं।
ट्रॉट्स्कीवाद के लिए उनके दशकों लंबे साहसिक संघर्ष को एसईपी श्रद्धांजलि देती है और उनके बच्चों और परिजनों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करती है।
पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच उन्हें गणेश के नाम से जाना जाता था। उन्होंने 1970 में आरसीएल ज्वाइन किया था। जल्द ही वो पूर्णकालिक काडर बन गए और आरसीएल की सेंट्रल कमेटी और पॉलिटिकल कमेटी (पीसी) के सदस्य चुन लिये गए। भारतीय उप महाद्वीप में ट्रॉट्स्कीवादी आंदोलन को खड़ा करने के संघर्ष में उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन स्वास्थ्यगत समस्याओं की वजह से, क़रीब डेढ़ दशक से वह सक्रिय राजनीतिक काम को जारी रखने में अक्षम रहे थे।
गणेश का जन्म 15 मई 1939 को मलेशिया में हुआ था, जहां उनका परिवार बस गया था। जब गणेश 16 साल के हुए, तब उनका परिवार श्रीलंका के जाफ़ना शहर से 30 किलोमीटर दूर अलावी के अपने गांव लौट गया था। उन्होंने अपने गृहनगर के पास नेलियाडी सेंट्रल कॉलेज में अंग्रेज़ी मीडियम से विज्ञान में अपनी पढ़ाई पूरी की।
उनका परिवार जब श्रीलंका वापस लौटा उस समय राजनीतिक उथल पुथल का बहुत तीख़ा दौर चल रहा था। श्रीलंका का सत्ताधारी अभिजात वर्ग मज़दूर वर्ग में ट्रॉट्स्कीवादी आंदोलन के बढ़ते प्रभाव से डरा हुआ था और इसीलिए उसने साम्प्रदायिक आधार पर मज़दूरों को बांटने के लिए तमिल विरोधी अंधराष्ट्रवाद के ज़हरीले अभियानों का सहारा लिया। और यह सब 1948 में आज़ादी मिलने के तुरंत बाद शुरू हो गया था जब यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) सरकार ने भारतीय मूल के लाखों तमिल भाषी बागान मज़दूरों के बुनियादी नागरिकता अधिकारों को रद्द कर दिया।
साल 1956 में श्रीलंका फ़्रीडम पार्टी (एसएलएफ़पी) ने सिंहला को एकमात्र आधिकारिक भाषा बनाने की प्रतिक्रियावादी नीति के आधार पर अपना चुनावी प्रचार अभियान चलाया और आम चुनावों में जीत हासिल की। इस अभियान का मक़सद था- तमिल भाषी लोगों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाना और लोगों में तीख़ा साम्प्रदायिक विभाजन पैदा करना। एसएलएफ़पी का प्रचार अभियान, दरअसल बढ़ते वर्गीय संघर्ष के जवाब में सत्ताधारी वर्ग के तबकों द्वारा चलाया गया एक प्रतिक्रियावादी कदम था। क्योंकि 1953 में एक बड़ी आम हड़ताल हुई थी जिसमें पूरे देश का चक्का जाम कर दिया गया था।
उस समय लंका सामा समाज पार्टी (एलएसएसपी) ट्रॉट्स्कीवादी होने का दावा करती थी, उसने इस साम्प्रदायिक नीति की मुख़ालिफ़त की। उसने तमिल और सिंहला दोनों को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता देने की मांग उठाई। इसने 1956 के 'आधिकारिक भाषा विधेयक' का विरोध किया और कार्यकर्ताओं से कहा कि वे सिंहली नस्लवादी गुंडों से तमिलों की रक्षा करें। इसने तमिल बुर्जुआ पार्टियों के तमिल राष्ट्रवाद और अलगाववाद की राजनीति की ओर बढ़ते रुझान का भी विरोध किया।
देश के तमिल बहुल उत्तरी इलाक़े में गणेश ने तमिल पार्टियों की सामप्रदायिक राजनीति को ख़ारिज किया और एलएसएसपी का समर्थन किया। 1958 के आस पास उन्होंने जाफ़ना में इसके युवा संगठन को ज्वाइन कर लिया। उस समय वो सेकेंड्री शिक्षा की पढ़ाई बस पूरी ही की थी।
ट्रॉट्स्कीवाद के प्रति उनका आकर्षण शून्य में नहीं पैदा हुआ था। 1940 के दशक के शुरुआती समय से ही, भारतीय उप महाद्वीप में ट्रॉट्स्कीवादी चौथे इंटरनेशनल की इकाई बोल्शेविक लेनिनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (बीएलपीआई) का जाफ़ना प्रायद्वीप में और साथ ही पूरे देश में काफ़ी प्रभाव था।
हालांकि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के अवसरवादी प्रवृत्ति के असर के चलते, उस समय की बड़ी मज़दूर पार्टियों में शामिल होने की आड़ में बीएलपीआई को ख़त्म कर दिया गया। दरअसल यह अवसरवाद मिशेल पाब्लो और अर्नेस्ट मैंडेल के नेतृत्व वाले चौथे इंटरनेशनल में उभरा था। श्रीलंका में बीएलपीआई का 1950 में एलएसएसपी के साथ विलय हो गया। एलएसएपी 'पाब्लोइट इंटरनेशनल' से जुड़ी थी और उसने 1953 में स्थापित आईसीएफ़आई द्वारा ऑर्थोडाक्स यानी पारंपरिक ट्रॉट्स्कीवाद के बचाव का विरोध किया।
हालांकि एलएसएसपी ने एसएलएफ़पी की 'ओनली सिंहली' नीति का विरोध किया था, लेकिन धीरे-धीरे उसने एसएलएफ़पी की सिंहली-समर्थक लोकलुभावन राजनीति को अपना लिया और 1964 में सिरिमा भंडारनायके की बुर्जुआ एसएलएफ़पी सरकार में शामिल हो गई। यह ट्रॉट्स्कीवादी आंदोलन के सबसे बुनियादी उसूलों के साथ एक ऐतिहासिक विश्वासघात था। ये उसूल थे समाजवादी अंतरराष्ट्रीयतावाद और बुर्जुआ वर्ग की संस्थाओं से मज़दूर वर्ग की राजनीतिक आज़ादी। 21 मांगों वाले आंदोलन को लेकर मज़दूर वर्ग के व्यापक उभार के बीच भंडारनायके को सत्ता हथियाने में इसने काफ़ी मदद की।
एलएसएसपी के राजनीतिक पतन पर पैब्लोइट इंटरनेशनल ने पर्दा डाला और ऐसा करके उसने बुर्जुआ सरकार में शामिल होने के लिए एलएसएसपी का रास्ता साफ़ किया। एलएसएसपी की इस गद्दारी के विरोध में, युवाओं का एक वर्ग आईसीएफ़आई की ओर मुड़ा और उसके राजनीतिक मार्गदर्शन में 1968 में आरसीएल की स्थापना की।
एलएसएसपी द्वारा मज़दूर वर्ग के साथ किए गए धोखे ने सांप्रदायिक राजनीति पर आधारित छोटे-मोटे बुर्जुआ आंदोलनों के उभरने का रास्ता खोल दिया। द्वीप के दक्षिण में उग्र हुए सिंहली युवाओं के बीच, 1960 के दशक के मध्य में 'जनता विमुक्ति पेरामुना' (जेवीपी) की स्थापना हुई। यह संगठन माओवादी-कास्त्रोवादी गुरिल्ला युद्ध और सिंहली लोकलुभावनवाद के एक कच्चे-पक्के मेल पर आधारित था। वहीं उत्तर में, 'लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम' (एलटीटीई) जैसे हथियारबंद तमिल समूह उभरे, जो अलगाववाद का प्रचार करते थे।
एलएसएसपी के विश्वासघात का गणेश ने पुरजोर विरोध किया, कुछ समय के लिए उन्होंने एलएसएसपी (आर) धड़े का समर्थन किया, जिसने इस विश्वासघात का विरोध किया था और एलएसएसपी से अलग हो गया था लेकिन फिर भी पाब्लोआइट इंटरनेशनल के साथ अपना संबंध बनाए रखा था। गणेश ने 'सन' के लिए स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम किया। यह 1970 के दशक की शुरुआत में कोलंबो से निकलने वाला एक मुख्याधारा का अख़बार हुआ करता था।
अधिकांश लोगों की तरह ही गणेश भी जल्द ही एलएसएसपी (आर) की अवसरवादी राजनीति से खिन्न हो गए। पार्टी ने 'यूनाइटेड लेफ्ट फ्रंट' को फिर से जीवित करने की कोशिश की। यह एलएसएसपी के नेतृत्व वाला गठबंधन था जिसमें स्टालिनवादी और सिंहली-सांप्रदायिक 'महाजन एकसाथ पेरामुना' शामिल थे। साथ ही उसने ट्रेड यूनियन के उग्र तेवर को बढ़ावा दिया जबकि उनमें क्रांतिकारी समाजवादी नज़रिए का पूरी तरह अभाव था।
इसी बीच गणेश की मुलाक़ात आरसीएल कॉमरेडों से हुई जो एलएसएसपी के विश्वासघात के ख़िलाफ़ व्यापक प्रचार अभियान चला रहे थे और क्रांतिकारी समाजवादी कार्यक्रम के आधार पर मज़दूर वर्ग की एकता के लिए संघर्ष कर रहे थे। आरसीएल के साथ बातचीत के बाद, जिसमें जनरल सेक्रेटरी कीर्ति बालासुरिया भी शामिल थे, उनकी ये समझ बनी की एलएसएसपी के विश्वासघात की जड़ पाब्लोवाद में मौजूद थी। इसके बाद वह आरसीएल में शामिल हो गए।
गणेश जल्द ही आरसीएल के पूर्ण कालिक कार्यकर्ता बन गए और अग्रणी कमेटियों में शामिल हो गए। उन्होंने कोलंबो, जाफ़ना और पहाड़ी इलाकों के बागानों में रहने वाले तमिल लोगों के बीच पार्टी के राजनीतिक काम को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। वे आरसीएल के तमिल भाषा के अख़बार 'थोलिलालर सेयिदी' (वर्कर्स न्यूज़) के लिए नियमित रूप से लिखते थे।
अप्रैल 1971 में गठबंधन सरकार ने हज़ारों ग्रामीण नौजवानों और जेवीपी के सदस्यों को जेल में ठूंस कर और उनकी हत्या करके जेवीपी के दुस्साहसिक हथियारबंद विद्रोह को बहुत क्रूर तरीक़े से कुचल दया। जब आरसीएल ने बर्बर दमन का विरोध किया तो सरकार उसके पीछे पड़ गई। पार्टी को ग़ैरक़ानूनी कर दिया गया और उसके अख़बारों को प्रतिबंधित कर दिया गया। गणेश, पार्टी के अंडरग्राउंड प्रकाशन को छपवाने में मदद करने वालों में शामिल थे।
जब 1972 में नए नामों से क़ानूनी प्रकाशन शुरू हुआ तो गणेश ने थोलिलालार पथाई (मज़दूरों का रास्ता) नाम के प्रकाशन में संपादकीय मंडल में काम किया। तमिल अलगाववाद की बांटने वाली सांप्रदायिक राजनीति के विरोध में मज़दूरों को एकजुट करने के पार्टी के नज़रिए के प्रति तमिल मज़दूरों और युवाओं को जोड़ने में उनकी अहम भूमिका थी।
एस.के. चंद्रशेखरन उत्तर भारत में आरसीएल से जुड़ने वाले शुरुआती लोगों में से एक थे। उन्होंने इस लेख के लेखक को बताया कि वे कम्युनिस्ट पार्टी (पीकिंग विंग) की ओर देख रहे थे। हालांकि गणेश के साथ उनकी बातचीत से उन्हें चीनी किस्म के स्टालिनवाद वाले माओवाद की विश्वासघाती भूमिका पर यकीन हो गया और इस तरह वो ट्रॉट्स्कीवाद के और क़रीब आए। चंद्रशेखरन और बाकी लोगों ने आरसीएल की जाफ़ना इकाई की स्थापना की।
कोलंबो में पब्लिक सेक्टर के कर्मचारी एन. पंचचरण ने बताया कि जब दूसरी बार एलएफ़पी गठबंधन की सरकार बनी और उसने एक साम्प्रदायिक संविधान थोपा जिसके तहत बौद्ध धर्म को राजकीय धर्म और सिंहला को आधिकारिक भाषा बना दिया गया तब तमिल राष्ट्रवाद की बयार में वो भी बह गए थे। हालांकि गणेश ने तमिल वर्करों के बीच में अभियान चलाने और उन्हें रंग और जातीयता से परे एकजुट होने की ज़रूत को समझाने में अग्रणी भूमिका निभाई। पंचचरण और अन्य लोगों ने मिलकर कोलंबो में पार्टी की इकाई गठित की।
साल 1979 में आरसीएल को समझ आने लगा था कि दक्षिण एशिया में मज़दूर वर्ग को एकजुट करना ज़रूरी है, इसलिए उसने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए गणेश को चेन्नई, तब के मद्रास, भेजा ताकि भारत में आईसीएफ़आई की इकाई के निर्माण का काम शुरू किया जा सके। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, उस समय के सीलोन के ट्रॉट्स्कीवादियों ने पूरे उपमहाद्वीप में बीएलपीआई गठित करने की पहलकदमी को अपने हाथ में लिया था। लेकिन 1940 के दशक के उत्तरार्द्ध में माइकल पाब्लो के प्रोत्साहन पर बीएलपीआई नेताओं ने पार्टी को भारत में निम्न पूंजीवादी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में मिला दिया।
गणेश और एसईपी के वयोवृद्ध नेता नंदा विक्रमसिंघे के सह लेखन में एक लेख में विस्तार से समझाया गया है- 'बीएलपीआई के विलय का दक्षिण एशिया में 'चौथे इंटरनेशनल' के विकास पर बहुत बुरा असर पड़ा। भारत में ट्रॉट्स्कीवादी आंदोलन लगभग ख़त्म ही हो गया।' इस घटना और 1964 में एलएसएसपी के विश्वासघात ने भारत में स्टालिनवादी पार्टियों, खासकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम को बहुत मज़बूत कर दिया।
गणेश को बिल्कुल शुरू से शुरू करना पड़ा। मद्रास के मज़दूर वर्ग के इलाक़े में बसने के साथ ही उन्होंने मज़दूरों और युवा लोगों के साथ संपर्क स्थापित किया और ट्रॉट्स्कीवादी नज़रिये की ज़रूरत को लेकर चर्चा की। उन्होंने अपने राजनीतिक कामों के लिए श्रीलंका से छपने वाले थोलिलालार पथाई का इस्तेमाल किया और आईसीएफ़आई के अन्य प्रकाशन भी उन्हें मिले।
उनके मुख्य राजनीतिक कार्यों में से एक था स्टालिनवादी पार्टियों की वर्ग-सहयोग वाली नीतियों और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सहित पूंजीवादी पार्टियों के लिए उनके समर्थन की पोल खोलना। भारतीय स्टालिनवाद की जड़ें सोवियत स्टालिनवादी नौकरशाही की उस प्रतिक्रियावादी भूमिका में थीं, जिसने अक्टूबर क्रांति और विश्व समाजवादी क्रांति के कार्यक्रम के साथ विश्वासघात किया था। श्रीलंका में अपने कामों की तरह ही गणेश ने आरसीएल के साथियों की मदद से भारत में आईसीएफ़आई समर्थकों का एक शुरुआती समूह इकट्ठा किया।
1985-86 में ब्रिटेन में आईसीएफ़आई का वर्कर्स रिवोल्यूशनरी पार्टी (डब्ल्यूआरपी) से विभाजन हो गया और आरसीएल समेत ट्रॉट्स्कीवादी आंदोलन के सभी धड़ों के कामों के लिए यह बुनियादी तौर पर एक बड़ा मोड़ था। डब्ल्यूआरपी का राजनीतिक पतन तब और साफ़ तौर पर दिखने लगा जब उसने पैब्लोवाद के ख़िलाफ़ राजनीतिक संघर्ष का रास्ता छोड़ दिया और स्टालिनवाद व बुर्जुआ राष्ट्रवाद, और ब्रिटेन में लेबर पार्टी व ट्रेड यूनियन नौकरशाही के प्रति और भी ज़्यादा खुले तौर पर अवसरवादी रुख़ अपना लिया।
जब 1985 के अंत में कीर्ति बालासूरिया मद्रास गए और गणेश और अन्य कॉमरेडों के साथ बातचीत की तो गणेश ने आईसीएफ़आई की लाईन का बहुत उत्साहपूर्वक समर्थन किया। 1986 और 1987 में डेविड नॉर्थ ने बालासूरिया के साथ मद्रास का दौरा किया और गणेश और अन्य कॉमरेडों के साथ विभाजन से जुड़े मुद्दों पर गहन चर्चा की। डेविड नॉर्थ इस समय डब्ल्यूएसडब्ल्यूएस के अंतरराष्ट्रीय संपादकीय बोर्ड के चेयरमैन हैं।
गणेश और आईसीएफ़आई के समर्थकों के एक ग्रुप ने 12 दिसंबर 1986 को एक बयान जारी किया जिसमें उन्होंने 'इंटरनेशनल कमेटी के ज़्यादातर सदस्यों द्वारा हीली, बांदा और स्लॉटर (डब्ल्यूआरपी नेताओं) के बागी गुट के ख़िलाफ़ चलाए गए संघर्ष का पूरी तरह से समर्थन किया। इस गुट ने आईसीएफ़आई की राजनीतिक और सैद्धांतिक नींव पर हमले करके अंतरराष्ट्रीय मज़दूर वर्ग की अगुवाई करने वाली ताक़त को स्टालिनवाद, सामाजिक जनवाद और राष्ट्रीय बुर्जुआ वर्ग के अधीन करने और इस तरह साम्राज्यवाद के ही अधीन करने की कोशिश की थी।'
तमिलनाडु में आईसीएफ़आई के समर्थकों के एक भारतीय ग्रुप ने कई राजनीतिक चुनौतियों का सामना किया। ट्रेड यूनियनों में स्टालिनवादी दबदबे के साथ-साथ, श्रीलंका में सांप्रदायिक युद्ध ने तमिल राष्ट्रवाद पर आधारित पार्टियों को मज़बूत करने में मदद की। ऐसा उन लोगों के बीच हुआ जो पूरे 'पाल्क जलडमरूमध्य' (बंगाल की खाड़ी और मन्नार की खाड़ी को जोड़ने वाला संकरा रास्ता) के किनारे श्रीलंका में रह रहे तमिलों की दुर्दशा से खुद को गहराई से जुड़ा हुआ महसूस करते थे।
दक्षिणपंथी यूएनपी सरकार, जो 1977 में एसएलएफ़पी गठबंधन सरकार के ख़िलाफ़ भारी विरोध के बीच सत्ता में आई थी, आईएमएफ़ की सलाह पर आई दुनिया भर की उन पहली सरकारों में से एक थी जिन्होंने बाज़ार-परस्त कड़े फ़ैसले लागू किए। जब नौकरियों, वेतन और ज़रूरी सेवाओं पर हमलों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हुआ, तो यूएनपी ने तमिल-विरोधी कट्टरपंथ और नफ़रत को और भड़काया। इसका नतीजा पूरे द्वीप पर तमिलों के ख़िलाफ़ जानलेवा हिंसा और एलटीटीई के साथ खुली जंग के रूप में सामने आया।
दक्षिणी तमिलनाडु में राजनीतिक अस्थिरता को लेकर चिंतित भारत सरकार ने श्रीलंका में सीधे हस्तक्षेप किया। जुलाई 1987 के भारत-श्रीलंका समझौते के तहत भारतीय सेना को द्वीप के उत्तर और पूर्व में तैनात किया गया ताकि एलटीटीई को निःशस्त्र किया जा सके। जिसके बाद तमिल अभिजात वर्ग को सीमित सत्ता साझेदारी की रियायत दी गई थी।
कोलंबो में आरसीएल के साथ तालमेल में, गणेश और उनके कॉमरेडों ने इस जटिल हालात में हस्तक्षेप किया। उन्होंने पार्टी के साहित्य को वितरित किया और मज़दूरों और युवाओं के बीच अनगिनत चर्चाएं आयोजित कीं। उन्होंने भारत सरकार के राजनीतिक दोमुंहापन को उजागर किया और मज़दूर वर्ग के लए साम्प्रदायिक राजनीति के भारी ख़तरे की चेतावनी दी।
यह समझाने के लिए एक कड़ा राजनीतिक संघर्ष करना पड़ा कि श्रीलंका और भारत में तमिल जनता के बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार तभी हासिल किए जा सकते हैं, जब मज़दूर वर्ग समाजवाद के लिए एकजुट होकर संघर्ष करे। गणेश ने पार्टी के तमिल-भाषा के प्रकाशनों में इन मुद्दों पर कई लेख लिखे।
बालासुरिया और 1987 में उनकी असामयिक मृत्यु के बाद आरसीएल के महासचिव का पद संभालने वाले विजे डायस समेत श्रीलंका के प्रमुख साथियों ने भारत का दौरा किया और वहाँ पार्टी के काम को आगे बढ़ाने के लिए गणेश के साथ मिलकर काम किया। सभी ने गणेश की गर्मजोशी भरी मेहमाननवाज़ी की तारीफ़ की।
बाद के सालों में आरसीएल के कॉमरेडों के साथ गणेश ने दौरा किया और पार्टी के काम को कलकत्ते तक पहुंचाया जिसे अब कोलकाता के नाम से जाना जाता है और जो पश्चिम बंगाल की राजधानी है। वहां उन्होंने काफ़ी समय गुजारा। 1940 के दशक में कलकत्ता बीएलपीआई के कामों का एक बड़ा केंद्र हुआ करता था।
साल 1991 में, प्रथम खाड़ी युद्ध के बीच, 16-17 नवंबर को बर्लिन में होने वाले 'साम्राज्यवादी युद्ध और उपनिवेशवाद के खिलाफ़ मज़दूरों के विश्व सम्मेलन' के लिए आईसीएफ़आई के अभियान के तहत, गणेश ने कलकत्ता में बैठकें आयोजित करने में मदद की। इन बैठकों को श्रीलंका के साथियों ने संबोधित किया। इनमें डियास भी शामिल थे। बर्लिन सम्मेलन साम्राज्यवादी युद्ध के ख़िलाफ़ मज़दूर वर्ग को एकजुट करने की दिशा में एक अहम पड़ाव था, क्योंकि स्टालिनवादी नौकरशाही द्वारा सोवियत संघ के विघटन के बाद, अमेरिका ने अपना वैश्विक दबदबा फिर से कायम करने के लिए दशकों तक चलने वाले युद्धों की शुरुआत की थी।
इस अभियान के दौरान, दुलाल बोस, ध्रुब ज्योति मजुमदार और गणेश दत्ता समेत पूर्व बीएलपीआई के सदस्यों ने अपने सहयोगी निर्मल समाज पाठी के साथ गणेश और अन्य कॉमरेडों से मुलाक़ात की। उन्होंने बीएलपीआई को ख़त्म करने में पैब्लोवाद की भूमिका को स्पष्ट किया। उन्होंने पैब्लोवादी यूनाइटेड सेक्रेटेरिएट से नाता तोड़ लिया और आईसीएफ़आई में शामिल हो गए, क्योंकि वे इसे ऑर्थोडॉक्स यानी पारंपरिक ट्रॉट्स्कीवाद का ही विस्तार मानते थे।
1998 में 'वर्ल्ड सोशलिस्ट वेब साइट' (डब्ल्यूएसडब्ल्यूएस) शुरू करने की आईसीएफ़आई की अहम पहल को लेकर गणेश बहुत उत्साहित थे। इसके बाद के सालों में, उन्होंने डब्ल्यूएसडब्ल्यूएस के लिए अहम मुद्दों पर खुद लेख लिखे और दूसरों के साथ मिलकर भी लेख लिखे।
जिन लोगों ने उनके साथ काम किया, मुश्किल हालात में भी उनके समर्पण, ऊर्जा और लगन को वे याद करते हैं। अपनी ज़िंदगी के आखिरी सालों में भी, जब बीमारी की वजह से उनकी शारीरिक क्षमता कम होती जा रही थी, वे सक्रिय रहे। उन्होंने अपने अनुभव और दृढ़ संकल्प का इस्तेमाल युवा साथियों को शिक्षित करने और ट्रॉट्स्कीवाद के सिद्धांतों की रक्षा करने के काम में किया।
गणेश के आखिरी दिनों और अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान उनकी मदद करने वाले भारतीय समर्थक आकाश देव ने इस लेखक को बताया- “गणेश डब्ल्यूएसडब्ल्यूएस द्वारा रोज़ाना किए जाने वाले राजनीतिक विश्लेषण को लेकर बहुत उत्साहित रहते थे। वह मुझसे डब्ल्यूएसडब्ल्यूएस में दी गई बातों को समझाने के लिए कहते थे क्योंकि वह खुद साइट नहीं पढ़ पाते थे। उन्हें ट्रॉट्स्कीवाद और आईसीएफ़आई पर बहुत भरोसा था।”
मज़दूर वर्ग के बीच ट्रॉट्स्कीवाद के संघर्ष के लिए कॉमरेड गणेशदेव के आजीवन समर्पण की याद श्रीलंका और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मज़दूरों और पार्टी के साथियों के बीच बनी रहेगी।
