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भारत की 'कॉकरोच जनता पार्टी': वंचित भारतीय नौजवानों को भटकाने के मकसद से बनाया गया एक राजनीतिक 'सेफ़्टी वॉल्व'

यह अनुवाद अंग्रेज़ी के मूल India’s Cockroach Janata Party: A political safety valve aimed at diverting India’s deprived youth का है जो 12 जून 2026 को प्रकाशित हुआ था।

दिल्ली में 6 जून को हुए सीजेपी के विरोध प्रदर्शन में मौजूद भीड़ का एक हिस्सा। (फ़ोटो: X/CJPforIndia) [Photo: X/CJPforIndia]

पिछले शनिवार को यानी छह जून को हज़ारों छात्र, बेरोज़गार और युवा प्रोफ़ेशनल भारत की राजधानी में सेंट्रल दिल्ली के जंतर मंतर पर इकट्ठा हुए। वहां हाल ही में गठित कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके की अगुवाई में एक प्रदर्शन का आह्वान किया गया था। सीजेपी का दावा है कि वह 'उन लोगों का एक राजनीतिक आंदोलन है जिसे सिस्टम ने हाशिए पर धकेल' दिया है।

प्रदर्शनकारियों ने हाल ही में सरकारी कॉलेजों में प्रवेश के लिए होने वाली परीक्षाएं- नीट और सीबीएसई में पेपर लीक को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग की। पेपर लीक की इस धोखाधड़ी ने सीधे तौर पर दसियों लाख छात्रों के भविष्य को प्रभावित किया है।

शनिवार का प्रदर्शन, सीजेपी का पहला प्रदर्शन था और इसके मार्फ़त नई नवेली पार्टी ने एक वायरल सोशल मीडिया परिघटना से ज़मीन पर एक राजनीतक पार्टी के रूप में दस्तक देने की कोशिश की। बेरोज़गारी और कम वेतन, ख़तरनाक गिग वर्क और ठेका प्रथा से त्रस्त मौजूदा पीढ़ी के बीच विस्फोटक गुस्से और हताशा को इसने आवाज़ दी है।

सीजेपी खुद को एक सिस्टम वरोधी ताक़त के रूप में पेश कर रही है और खुद को जेनरेशन ज़ेड जिसे संक्षिप्त में 'जेन ज़ी' कहा जाता है, से जोड़ती है और उन 'जेन ज़ी प्रदर्शनों' से जोड़ती है जो नेपाल, कीनिया और अन्य जगहों पर फूट पड़ा था। यह खुद को 'भारत का पहला ऐसा राजनीतिक आंदोलन' बताती है जो युवाओं, बेरोज़गारों और अपने विचार ऑनलाइन प्रकट करने वालों के लिए बनाई गई है।

फिर भी, सीजेपी के बारे में जो ख़ास बात है, वो ये कि इसके संस्थापक दीपके कोई स्वतःस्फूर्त नागरिक सामाजिक कार्यकर्ता नहीं हैं। प्रदर्शन के लिए वो बोस्टन से चलकर आए थे। बोस्टन यूनिवर्सिटी में वह 'पब्लिक रिलेशंस' की मास्टर डग्री की पढ़ाई करते हैं। उनके पास सोशल मीडिया और आम आदमी पार्टी के चुनावी अभियान से सालों तक जुड़े रहने का अनुभव है और उनकी ट्रेनिंग कम्युनिकेशन स्ट्रेटेजिस्ट के रूप में हुई है। आम आदमी पार्टी एक दक्षिणपंथी पूंजीवादी पार्टी है जिसने दिल्ली में एक दशक तक शासन किया और मौजूदा समय में पंजाब में उसकी सरकार है। दीपके की पृष्ठभूमि से पता चलता है कि सीजेपी क्या है और आखिरकार यह किस राजनीतिक मकसद को पूरा करती है।

कोर्ट से अपमान

सीजेपी की शुरुआत सोशल मीडिया पर उस समय हुई जब भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने 15 मई को सुप्रीम कोर्ट की बेंच से बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की। जिस न्यायाधीश से बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों को बचाने की उम्मीद की जाती है उसने रोज़गार न पाने वाले करोड़ों भारतीय युवाओं को ‘परजीवी’ और ‘कॉकरोच’ कहा। ‘द वायर’ ने लिखा कि यह ज़ुबान फिसलने का मामला नहीं था। यह उस गहरे तिरस्कार का खुला प्रदर्शन था, जिस नज़र से शासक वर्ग सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित लोगों और संघर्ष कर रहे शिक्षित मध्यमवर्गीय युवाओं को देखता है, जबकि कॉरपोरेट मीडिया भारत के पूंजीवादी 'उदय' का जश्न मनाने में मशगूल है।

दीपके ने राजनीतिक संदेश देने में अपने प्रोफ़ेशनल हुनर का इस्तेमाल करते हुए उसके अगले ही दिन एक सोशल मीडिया मीम साझा किया, जिसमें कॉकरोच को प्रतिरोध और ज़िंदा रहने के प्रतीक के रूप में पेश किया गया था। साथ ही उन्होंने सत्तारूढ़ दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) जैसे ही एक नाम का इस्तेमाल करते हुए उसका मज़ाक भी उड़ाया। दीपके स्वयं स्वीकार करते हैं कि उस समय कॉकरोच जनता पार्टी केवल व्यंग्य थी, लेकिन उनकी इस पहल ने लोगों के बीच गहरी प्रतिक्रिया पैदा की। कुछ ही दिनों में सीजेपी के इंस्टाग्राम फ़ॉलोअर्स की संख्या 2.2 करोड़ से अधिक हो गई, जो बीजेपी, कांग्रेस और भारत की अन्य रजिस्टर्ड राजनीतिक दलों से भी ज़्यादा थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी हिंदुत्ववादी सरकार की प्रतिक्रिया उम्मीद के मुताबिक़ निरंकुशता वाली रही। 21 मई को भारत में सीजेपी का एक्स अकाउंट ब्लॉक कर दिया गया। भारत के इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) ने दावा किया कि इसके कंटेंट 'राष्ट्रीय सुरक्षा और भारत की संप्रभुता के लिए ख़तरा' हैं। यह कार्रवाई केवल मोदी शासन के निरंकुश चरित्र को ही नहीं दिखाती, बल्कि इस बात को भी उजागर करती है कि सामाजिक संकट से पैदा होने वाले जन-विरोध का उसे कितना डर है। अप्रैल में जब दिल्ली के औद्योगिक इलाक़ों में मज़दूरों के बड़े प्रदर्शन हुए थे, तब बीजेपी सरकार ने राज्य की हिंसा और बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियों का सहारा लिया था।

भारत की बेरोज़गारी का संकट उसके पूंजीवादी विकास की ढांचागत विशेषता है, कोई अस्थायी गड़बड़ी नहीं। सरकार के अपने वर्क फ़ोर्स सर्वे के अनुसार, भारत की बेरोज़गारी दर पिछले 45 सालों में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच चुकी है। यह आंकड़ा इतना भयानक था कि मोदी सरकार ने शुरुआत में इसे दबाने की कोशिश की। हर साल लेबर मार्केट में प्रवेश करने वाले एक करोड़ से अधिक युवाओं में से केवल चंद लोगों को ही संगठित क्षेत्र में रोज़गार मिल पा रहा है। सरकारी आंकड़े श्रम बल में बढ़ोत्तरी का दावा करते हैं, लेकिन यह बढ़ोत्तरी मुख्य रूप से स्वरोज़गार में बढ़ोतरी की वजह से दिखाई देती है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग रेहड़ी लगाने या छोटे किसान के रूप में किसी तरह गुज़ारा करने की कोशिश कर रहे हैं।

व्यवस्था की ओर से प्रचारित 'मेरिटोक्रेसी' (मेरिट के आधार पर अवसर) का वादा, यानी नीट में अच्छा स्कोर या प्रतियोगी परीक्षा में शानदार प्रदर्शन कम से कम सम्मानजनक भविष्य सुनिश्चित करेगा, अब एक क्रूर भ्रम साबित हुआ है। अब तो इन परीक्षाओं में भी भ्रष्टाचार और पेपर लीक की घटनाएं सामने आ रही हैं। दूसरी ओर भारत के 229 अरबपति, जिनकी कुल संपत्ति एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक है, शादी समारोहों और अन्य भव्य आयोजनों पर करोड़ों डॉलर यूं ही ख़र्च कर रहे हैं। इसका उदाहरण मुकेश अंबानी के सबसे छोटे बेटे की 2024 की शादी के समारोहों में देखा गया।

‘आप’: 'भ्रष्टाचार विरोध' से साम्राज्यवाद परस्त व्यवस्था की पार्टी तक

सीजेपी के महत्व को समझने के लिए यह समझना ज़रूरी है कि इसके संस्थापक का मूल संगठन ‘आप’ किस रूप में बदल चुका है। 2011 के अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकली ‘आप’ ने ख़ुद को उस ताक़त के रूप में पेश किया था जो भ्रष्ट राजनीतिक सिस्टम और बड़े कारोबार से उसके रिश्तों को ख़त्म कर देगी। लेकिन यह वादा बहुत जल्दी बिखर गया। 2014 की शुरुआत में केवल 49 दिन मुख्यमंत्री रहने के बाद जब अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफ़ा दिया, तब वे खुलकर बड़े कारोबारियों से कह रहे थे, 'हमें बताइए कि हमें क्या करना चाहिए।'

इसके बाद ‘आप’ 2015 में दिल्ली की सत्ता में लौटी। उसे बीजेपी और कांग्रेस के ख़िलाफ़ जनता के ग़ुस्से का लाभ मिला। लेकिन 'आम आदमी' की पार्टी होने के तमाम दावों के बावजूद वह भी एक सामान्य पूंजीवादी पार्टी साबित हुई। उसने निवेशक परस्त नीतियां लागू कीं, भारत के शासक वर्ग की चीन-विरोधी रणनीतिक साझेदारी का समर्थन किया और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ आक्रामक बयानबाज़ी में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया।

आख़िरकार ‘आप’ खुद भी भ्रष्टाचार के मामलों में घिर गई, जिनमें दिल्ली आबकारी नीति मामला सबसे चर्चित रहा। बीजेपी ने इसका राजनीतिक लाभ उठाया। भ्रष्टाचार विरोधी छवि नष्ट होने के बाद पार्टी ने भारतीय बुर्जुआ राजनीति के एक पुराने हथियार, यानी सांप्रदायिकता का सहारा लिया। 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में ‘आप’ ने व्यवस्थित रूप से 'सॉफ्ट हिंदुत्व' संदेशों का इस्तेमाल किया। उसने केजरीवाल की धार्मिक छवि और मंदिर यात्राओं को प्रमुखता दी और सांस्कृतिक पहचान को इस तरह पेश किया कि वह बीजेपी से उसी के मैदान में होड़ कर सके।

इसी पृष्ठभूमि में सीजेपी के ‘आप’ का गुप्त मोर्चा होने के दावों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। 2024 में बोस्टन यूनिवर्सिटी जाने से पहले दीपके ने मनीष सिसोदिया के साथ अपनी तस्वीर साझा की थी। सिसोदिया लंबे समय तक केजरीवाल के सबसे क़रीबी सहयोगी रहे और 2015 से 2023 तक दिल्ली के उपमुख्यमंत्री थे। तस्वीर के साथ दीपके ने लिखा था कि 'कोई दूरी ‘आप’ के प्रति मेरी प्रतिबद्धता को कभी कमज़ोर नहीं कर सकती।' बाद में सिसोदिया ने भी सोशल मीडिया पर सीजेपी का नाम लेकर समर्थन किया। पूर्व नौकरशाह आशीष जोशी, जो पहले सीजेपी से जुड़े थे, दीपके के उस सवाल का जवाब न देने पर संगठन छोड़ गए जिसमें उनसे ‘आप’ से अलग रुख़ को लेकर पूछा गया था।

दीपके बाद में यह कह चुके हैं कि सीजेपी का ‘आप’ से कोई संबंध नहीं है, लेकिन उन्होंने ‘आप’ के रिकॉर्ड से ख़ुद को अलग दिखाने के लिए कोई ठोस बात नहीं कही। फ़िलहाल वे सीजेपी के वास्तविक उद्देश्य को भरसक गोलमोल रखने की कोशिश कर रहे हैं। वे यह दावा करते हैं कि वे अन्य राजनीतिक दलों के उलट युवाओं की बात सुनना चाहते हैं। सीजेपी के घोषणापत्र में शामिल पांच मांगें केवल संसदीय और चुनावी व्यवस्था में मामूली सुधारों तक सीमित हैं, जैसे विधायकों के दल बदल पर रोक। इनमें से कोई भी मांग बेरोज़गारी, शिक्षा की बदहाल स्थिति या व्यापक ग़रीबी जैसे मुद्दों को नहीं छूती। न ही ये मांगें इस बात पर सवाल उठाती है कि मुट्ठीभर पूंजीपतियों को भारत की संपत्ति पर एकाधिकार रखने का अधिकार क्यों होना चाहिए।

भले ही सीजेपी ‘आप’ का छिपा हुआ मोर्चा न हो, फिर भी यह साफ़ है कि इस आंदोलन का उद्देश्य युवाओं के ग़ुस्से का इस्तेमाल कर उसे फिर से पूंजीवादी राजनीति की ओर मोड़ना है। इसका मक़सद सिस्टम पर मामूली सुधारों के लिए दबाव बनाना है, जबकि बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और भारतीय समाज की अनेक समस्याओं की जड़, यानी पूंजीवादी सामाजिक व्यवस्था, से ध्यान हटाना है।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम ने मोदी सरकार की ओर से सीजेपी की सोशल मीडिया मौजूदगी को दबाने की आलोचना की है और कहा है कि सीजेपी को मिला ऑनलाइन समर्थन 'बेरोज़गारी जैसे मुद्दों पर बीजेपी सरकार के ख़िलाफ़ मौजूद असंतोष को दिखाता है।' लेकिन सीजेपी को लेकर सीपीएम की प्रतिक्रिया उसकी अपनी राजनीतिक विफलता को भी उजागर करती है। महासचिव एम. ए. बेबी ने सावधानीपूर्वक कहा कि इस घटना का 'पूरी गंभीरता से अध्ययन किया जाना चाहिए' क्योंकि यह 'युवा पीढ़ी की राजनीतिक अभिव्यक्ति के बदलते रूपों' को दिखाती है। यह उस पार्टी की भाषा है जो अपने विकल्प खुले रख रही है। यह किसी बुर्जुआ राजनीतिक चाल का सिद्धांत आधारित विरोध नहीं, बल्कि यह आकलन है कि सीजेपी उसके लिए उपयोगी साबित हो सकती है या नहीं। दशकों तक बीजेपी का विरोध करने के नाम पर दक्षिणपंथी बुर्जुआ सरकारों को सहारा देने वाली सीपीएम की सीजेपी को राजनीतिक जाल के रूप में बेनकाब करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। उसकी दिलचस्पी इस बात में ज़्यादा है कि क्या सीजेपी उसकी कमज़ोर होती राजनीतिक स्थिति और संसदीय राजनीति को नया जीवनदान दे सकती है।

अधिक से अधिक यही कहा जा सकता है कि दीपके के नेतृत्व वाली सीजेपी उसी राज्य तंत्र और पूंजीवादी सामाजिक-आर्थिक सिस्टम का थोड़ा साफ़-सुथरा और संशोधित संस्करण चाहती है, जिसने सामाजिक संकट को और गहरा किया है और पश्चिम एशिया, रूस और चीन के ख़िलाफ़ अमेरिकी सैन्य-रणनीतिक अभियान सहित वैश्विक साम्राज्यवादी संघर्षों में घी डालने का काम किया है।

भारत के युवा अपने ग़ुस्से और निराशा में अकेले नहीं हैं। यही ढांचागत बेरोज़गारी, यही भयावह असमानता और यही संस्थागत सड़न यूरोप, अमेरिका, अफ़्रीका और एशिया के युवाओं को भी प्रभावित कर रही है। यह समानता केवल एक वास्तविक निष्कर्ष की ओर संकेत करती है। समस्या केवल कोई मंत्री, कोई मुख्य न्यायाधीश या केवल मोदी और उनकी हिंदुत्ववादी बीजेपी नहीं है। समस्या वह वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था है जो इन परिस्थितियों को सामान्य बना रही है। इसका वास्तविक समाधान मज़दूर वर्ग और युवाओं के एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय आंदोलन के निर्माण में है, जो विश्व समाजवादी क्रांति के दृष्टिकोण पर आधारित हो। यानी समाज का पुनर्गठन उन लोगों के हित में हो जो संपत्ति पैदा करते हैं, न कि उन लोगों के लिए जो उससे लाभ निचोड़ते हैं। भारत के युवाओं को इसी दिशा की ओर देखना चाहिए।

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