यह अनुवाद अंग्रेज़ी “The goon attack at Kolkata’s Jadavpur University—The BJP’s war on student dissent” के मूल का है जो 30 August 2026 को प्रकाशित हुआ था।
आर.ए. वासिख (पहचान छिपाने के लिए बदला हुआ नाम) ने यह लेख भेजा है, जो पश्चिम बंगाल की एक यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट हैं और वर्ल्ड सोशलिस्ट वेब साइट के नियमित पाठक हैं। इस लेख में उन्होंने बताया है कि पश्चिम बंगाल की भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार किस तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) का इस्तेमाल छात्रों के ख़िलाफ़ हिंसा करने के लिए कर रही है।
ये हमले ऐसे समय में हुए हैं, जब बीजेपी के कॉरपोरेट समर्थक और निरंकुश शासन से पैदा हुए गहराते सामाजिक संकट के ख़िलाफ़ पूरे भारत में युवा और कामगार बड़े पैमाने पर प्रदर्शन कर रहे हैं।
19-20 अगस्त की रात पश्चिम बंगाल के कोलकाता में जादवपुर यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स पर हिंदू वर्चस्ववादी गुंडों की भीड़ ने हमला किया। यह हमला भारत के दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस आह्वान के कुछ ही दिन बाद हुआ, जिसमें उन्होंने सरकार के वामपंथी विरोधियों की 'पहचान करने और उन्हें अलग-थलग करने' की बात कही थी।
हमलावरों में एबीवीपी के सदस्य और बाहर से लाए गए गुंडे शामिल थे। वे 20 अगस्त को रात करीब 12 बजकर 37 मिनट पर गेट नंबर 4 से कैंपस में दाख़िल हुए। उन्होंने यूनिवर्सिटी में तोड़फोड़ की, वामपंथी छात्र संगठनों के झंडे और पोस्टर जलाए और प्रशासनिक इमारत अरविंदो भवन के अंदर शरण लिए स्टूडेंट्स को निशाना बनाया। वीडियो में आगज़नी, पत्थरबाज़ी और यूनिवर्सिटी की इमारतों में जबरन घुसने की कोशिश दिखाई देती है। भीड़ इमारतों में आग लगाने की कोशिश कर रही थी जबकि स्टूडेंट्स उसके अंदर थे।
जादवपुर यूनिवर्सिटी भारत के प्रमुख सार्वजनिक उच्च शिक्षण संस्थानों में से एक है और यहां वामपंथी छात्र राजनीति की गतिविधियों का एक लंबा इतिहास रहा है।
लेकिन हालिया दक्षिणपंथी हमले का तत्काल कारण, फैकल्टी ऑफ़ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी स्टूडेंट्स यूनियन (एफईटीएसयू) की जनरल बॉडी बैठक में हुआ विवाद था। एबीवीपी समर्थकों ने इस बैठक में उत्पात मचाने और फर्ज़ी आरोपों की बुनियाद पर इसे न होने देने की कोशिश की। उनका दावा था कि यह बैठक अवैध है, क्योंकि पिछले कुछ सालों से एफ़ईटीएसयू शीर्ष पदों के लिए चुनाव नहीं हुए हैं।
एबीवीपी आरएसएस का छात्र संगठन है। आरएसएस एक फ़ासीवादी अर्धसैनिक संगठन है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीजेपी का वैचारिक मार्गदर्शक है। यूनिवर्सिटी कैंपस में एबीवीपी, बीजेपी के लिए 'शॉक ट्रुप्स' यानी अचानक हमला करने वाले हिंसक गिरोह की तरह काम करता है। यह हिंसा, धमकी और 'राष्ट्र-विरोधी' जैसे आरोपों का इस्तेमाल कर राजनीतिक असहमति को दबाने की कोशिश करता है।
लेकिन दिलचस्प है कि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने 19-20 अगस्त को हुए गुंडों के हमले को लेकर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई जब उसे भारी सार्वजनिक विरोध का सामना करना पड़ा। हालांकि हमले में एबीवीपी की भूमिका साफ़ दिखाई दे रही थी, लेकिन वाइस चांसलर चिरंजीब भट्टाचार्य की शिकायत में दंगा, तोड़फोड़ और आपराधिक धमकी के लिए 'अज्ञात बाहरी लोगों/व्यक्तियों' को ज़िम्मेदार बताया गया।
पिछले शुक्रवार तक इस मामले में किसी को भी गिरफ़्तार नहीं किया गया था। हमले के क़रीब छह दिन बाद 26 अगस्त को पुलिस यूनिवर्सिटी गई और सीसीटीवी फुटेज अपने साथ ले गई।
इससे पहले टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने रिपोर्ट किया था कि सीसीटीवी फुटेज में भीड़ को बिना किसी रोक-टोक के अंदर दाख़िल होते हुए देखा गया। इससे सवाल उठे कि क्या यूनिवर्सिटी के अंदर मौजूद कुछ लोगों ने हमलावरों को घुसने में मदद की थी?
इस मामले में न्यायिक हस्तक्षेप की एक याचिका पर तत्काल सुनवाई पर कलकत्ता हाई कोर्ट ने साफ़ इनकार कर दिया। यूनिवर्सिटी की जांच समिति की अगुवाई करने के लिए एक पूर्व शिक्षाविद् को नियुक्त किया लेकिन उन्होंने खुद को इस समिति से अलग कर लिया।
पश्चिम बंगाल पर बीजेपी का कब्ज़ा
जादवपुर में हुई हिंसा को मई 2026 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी की 'ऐतिहासिक' जीत के संदर्भ में समझना होगा। बीजेपी ने 294 में से 208 सीटें जीतीं और 15 साल से सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सरकार को बाहर कर दिया। इसके साथ ही वह भारत के चौथे सबसे अधिक आबादी वाले राज्य में पहली बार सत्ता में आई।
सत्ता संभालते ही पहले टीएमसी नेता रहे और बाद में बीजेपी में शामिल हुए सुवेंदु अधिकारी नए मुख्यमंत्री बने। उन्होंने सबसे पहले ग़रीब झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोगों, ख़ासकर मुसलमानों और दूसरे अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर पुलिसिया हिंसा शुरू कर दी।
पश्चिम बंगाल की बीजेपी सरकार, किसी भी तरह के विरोध, ख़ास तौर पर युवाओं और मज़दूर वर्ग के विरोध को दबाने के लिए एबीवीपी और हिंदू वर्चस्ववादी ग्रुपों समेत अपने शॉक ट्रुप्स का इस्तेमाल कर रही है। जादवपुर में एबीवीपी का हिंसक हमला बढ़ते सामाजिक विरोध के ख़िलाफ़ पहले ही हमला बोलने की कार्रवाई का हिस्सा है।
एबीवीपी का झूठा बहाना
एबीवीपी का यह दावा पूरी तरह झूठा है कि एफईटीएसयू की जनरल बॉडी बैठक अवैध थी, क्योंकि एफईटीएसयू के चुनाव नहीं हुए हैं। एबीवीपी को अच्छी तरह पता है कि 2011 से 2026 तक लगातार तीन कार्यकाल तक पश्चिम बंगाल में सत्ता में रही टीएमसी सरकार ने 2013 से छात्र संघों के चुनाव पर रोक लगा रखी थी। इसके बाद टीएमसी ने पश्चिम बंगाल यूनिवर्सिटीज़ एंड कॉलेजेज़ (एडमिनिस्ट्रेशन एंड रेग्युलेशन) एक्ट, 2017 पारित किया, जिसने राज्य में छात्र संघ चुनावों को लगभग अवैध ही कर दिया। टीएमसी ने यह क़ानून छात्रों की किसी भी राजनीतिक अभिव्यक्ति पर रोक लगाने के लिए बनाया था। पार्टी का तर्क था कि छात्र यूनिवर्सिटी में 'पढ़ने' के लिए आते हैं, राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए नहीं। डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स इलेक्शन्स पर टीएमसी की रोक से फ़ायदा उठाने के बाद, अब एबीवीपी तब स्टूडेंट्स को भीड़ का हिंसा बना रहा है जब वे संगठित होने की कोशिश रहे थे। और इसके लिए एबीवीपी ने चुनाव होने का बहाना लेकर अपनी हिंसक कार्रवाई को सही ठहरा रहा है।
उमर ख़ालिद का उत्पीड़न
जादवपुर में हुआ हमला कोई अकेली घटना नहीं है। बीजेपी की अब 12 साल लंबी केंद्रीय सरकार के दौरान वामपंथी छात्रों और शिक्षकों पर हमले होते रहे हैं। उन्हें अक्सर 'राष्ट्र-विरोधी' कहकर निशाना बनाया जाता है।
शायद सबसे चर्चित मामला कार्यकर्ता और स्टूडेंट लीडर उमर ख़ालिद का है। 2018 में नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में 'ख़ौफ़ से आज़ादी' नाम के एक कार्यक्रम में शामिल होने के दौरान एक अज्ञात बंदूकधारी ने ख़ालिद पर गोली चलाई थी। यह कार्यक्रम अल्पसंख्यकों, छात्रों और तर्कवादियों पर बढ़ते हमलों को सामने लाने के लिए आयोजित किया गया था। ख़ालिद इस हत्या की कोशिश में बच गए। लेकिन सितंबर 2020 में धार्मिक आधार पर भेदभाव करने वाले नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के ख़िलाफ़ शांतिपूर्ण प्रदर्शनों का नेतृत्व करने के आरोप में कठोर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) क़ानून (यूएपीए) के तहत उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। स्टूडेंट और मज़दूर एकजुटता को निशाना बनाने के लिए ख़ालिद को लगातार जेल में रखना भारतीय राज्य की सबसे निंदनीय कार्रवाइयों में से एक है।
जादवपुर हमले से सिर्फ़ चार दिन पहले, 15 अगस्त को मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में उन लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई का आह्वान किया था, जिन्हें उन्होंने 'दिमाग़ी नक्सल' बताया था। मोदी ने दावा किया कि भारतीय राज्य हथियारबंद नक्सली-माओवादी विद्रोह को दबाने में बड़े पैमाने पर सफल रहा है। लेकिन उन्होंने कहा कि 'नक्सल मानसिकता' वाले लोग, यानी वामपंथी नज़रिए से सरकार का विरोध करने वाले लोग, अब भी मौजूद हैं और उन्हें 'पहचानकर अलग-थलग' किया जाना चाहिए।
'दिमाग़ी नक्सल' शब्द जानबूझकर अस्पष्ट रखा गया है। यह ट्रंप प्रशासन की उस कार्रवाई जैसा है, जिसमें एक ऐसे एंटीफ़ा आंदोलन को निशाना बनाया गया, जिसका वजूद था ही नहीं। इसका मक़सद वामपंथी छात्रों, बुद्धिजीवियों और दूसरे राजनीतिक विरोधियों पर राज्य की निगरानी और उनके ख़िलाफ़ भीड़ की हिंसा को सही ठहराना है। यह बीजेपी के 'अर्बन नक्सल' शब्द के उस पुराने शिगूफ़े की भी याद दिलाता है, जिसका इस्तेमाल असहमति को अपराध की तरह पेश करने के लिए किया जाता रहा है।
19-20 अगस्त को गुंडों के हमले के बाद पश्चिम बंगाल के मंत्री अर्जुन सिंह ने इस संबंध को साफ़ तौर पर सामने रखा। उन्होंने 23 अगस्त को कहा कि एबीवीपी के सदस्यों को 'दिमाग़ी नक्सल' लोगों को जादवपुर यूनिवर्सिटी से बाहर खदेड़ने के लिए 'और सख़्त क़दम' उठाने होंगे।
इस बीच बीजेपी नेता दिलीप घोष ने यूनिवर्सिटी में 'राष्ट्र-विरोधी' गतिविधियों के ख़िलाफ़ 'सर्जिकल स्ट्राइक' की धमकी दी। 19-20 अगस्त की घटनाओं के बाद दिए गए ऐसे बयान राज्य के सबसे ऊंचे स्तरों से हिंसा के लिए साफ़ तौर पर भड़काने के रूप में सामने आते हैं।
पश्चिम बंगाल में बीजेपी के सत्ता तक पहुंचने का रास्ता किसने बनाया?
पश्चिम बंगाल पर बीजेपी का कब्ज़ा अचानक नहीं हुआ। यह उन दक्षिणपंथी, पूंजी परस्त नीतियों का सीधा नतीजा है, जिन्हें बीजेपी का विरोध करने का दावा करने वाली वही 'वाम' ताक़तें लंबे समय से अपनाती रही हैं।
साल 2011 तक 34 साल तक पश्चिम बंगाल पर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम के नेतृत्व वाले लेफ़्ट फ़्रंट का शासन था। सीपीएम एक स्टालिनवादी पार्टी है, जिसने बहुत पहले ही समाजवाद के लिए संघर्ष करने का दिखावा भी छोड़ दिया था। उसकी सरकार ने 'निवेशक परस्त' नीतियां अपनाईं। इनमें सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को बंद करना, स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन बनाना और बड़े कारोबारी प्रोजेक्ट्स के लिए किसानों की ज़मीन लेना शामिल था। साल 2007 में लेफ़्ट फ़्रंट सरकार ने नंदीग्राम में ज़मीन लिए जाने का विरोध कर रहे किसानों को दबाने के लिए पुलिस और पार्टी के गुंडों का इस्तेमाल किया। इसमें कम से कम 30 लोग मारे गए।
राष्ट्रीय स्तर पर सीपीएम ने कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस सरकार को समर्थन दिया था। इस सरकार ने 'निवेशक परस्त' आर्थिक बदलावों को आगे बढ़ाया और अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ 'वैश्विक रणनीतिक साझेदारी' भी की। स्टालिनवादियों ने बीजेपी को रोकने के नाम पर मज़दूर वर्ग को कांग्रेस पार्टी का पिछलग्गू होने को सही ठहराया। इस नीति ने बीजेपी को नहीं रोका। इसने मज़दूर वर्ग को राजनीतिक रूप से कमज़ोर किया और ऐसा राजनीतिक ख़ालीपन पैदा किया, जिसे हिंदू वर्चस्ववादी दक्षिणपंथ ने भरा।
ममता बनर्जी के नेतृत्व में 2011 से 2026 तक पश्चिम बंगाल की सत्ता में रही टीएमसी ने राज्य में लेफ़्ट फ़्रंट के शासन के दौरान शुरू की गई दक्षिणपंथी सामाजिक और आर्थिक नीतियों को और तेज़ किया। पहले बीजेपी की सहयोगी और कम्युनिस्ट विरोधी नेता रहीं बनर्जी ने ख़ुद को 'ग़रीबों के पक्ष' में दिखाया, लेकिन उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार और बड़े कारोबार के पक्ष में काम करने के आरोप लगते रहे। उनकी सरकार ने राजनीतिक विरोधियों के ख़िलाफ़ नियमित रूप से हिंसा का इस्तेमाल किया।
यही वह राजनीतिक स्थिति थी, जो दशकों से चली आ रही स्टालिनवादी नीतियों और दक्षिणपंथी शासन से बनी थी और जिसमें बीजेपी आगे बढ़ने में कामयाब हुई। सीपीएम के संगठन से जुड़े एक बड़े हिस्से ने, जिसमें उसके गुंडों का नेटवर्क भी शामिल था, 2010 के दशक के मध्य से बीजेपी का दामन थाम लिया। स्टालिनवादियों और हिंदू दक्षिणपंथ के बीच राजनीतिक दूरी बहुत कम साबित हुई, क्योंकि दोनों एक ही वर्ग के हितों के लिए काम करते हैं।
सीपीएम का छात्र संगठन स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया (एसएफआई), दशकों से जादवपुर में छात्र राजनीति पर हावी रहा है। वह ख़ुद को बीजेपी के ख़िलाफ़ लोकतांत्रिक अधिकारों का रक्षक बताता है। लेकिन एसएफआई को छात्रों या मज़दूर वर्ग के हितों का स्वतंत्र प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। वह ऐसी पार्टी का हिस्सा है, जिसने उन्हीं कॉरपोरेट समर्थक और मज़दूर विरोधी नीतियों को लागू किया, जिनसे पैदा हुए सामाजिक संकट से बीजेपी को फ़ायदा मिल रहा है। उसकी राजनीति ने ऐतिहासिक रूप से स्टूडेंट्स और मज़दूरों को कांग्रेस पार्टी और दूसरी पूंजीवादी पार्टियों के साथ संसदीय गठबंधनों का पिछलग्गू बनाए रखा। कांग्रेस लंबे समय तक केंद्र सरकार में भारतीय बुर्जुआ वर्ग की पसंदीदा पार्टी रही है। एसएफ़आई हिंदू वर्चस्ववादी दक्षिणपंथ के ख़िलाफ़ वास्तविक संघर्ष का नेतृत्व करने में सक्षम नहीं है। ऐसा संघर्ष वर्ग संघर्ष पर आधारित होना चाहिए, चुनावी गठजोड़ पर नहीं।
मज़दूर वर्ग के एक स्वतंत्र राजनीतिक आंदोलन के लिए
जादवपुर यूनिवर्सिटी में हुई हिंसा की स्पष्ट रूप से निंदा की जानी चाहिए। छात्रों, शिक्षकों और मज़दूरों का साझा हित है कि वे बीजेपी के निरंकुश हमले से अभिव्यक्ति की आज़ादी, राजनीतिक संगठन बनाने के अधिकार और शिक्षा की रक्षा करें। लेकिन यह ज़िम्मेदारी स्टालिनवादी संगठनों या भारतीय बुर्जुआ वर्ग के किसी भी हिस्से को नहीं सौंपी जा सकती। सीपीएम, टीएमसी और कांग्रेस पार्टी ने अलग-अलग तरीक़ों से उस रास्ते को तैयार किया है, जिसका नतीजा बीजेपी के उभार के रूप में सामने है।
हिंदू वर्चस्ववादी दक्षिणपंथ के ख़िलाफ़ संघर्ष के लिए हर तरह के बुर्जुआ राष्ट्रवाद और पॉपुलर फ़्रंट की राजनीति से निर्णायक दूरी बनानी होगी। मज़दूर वर्ग को एक स्वतंत्र राजनीतिक ताक़त के रूप में संगठित करना होगा। उसे सांप्रदायिक और जातिगत बंटवारे से ऊपर उठकर अंतरराष्ट्रीयतावादी समाजवादी कार्यक्रम के आधार पर एकजुट करना होगा। ऐसे आंदोलन के विकास के ज़रिए, जो कामगारों की सरकार और विश्व समाजवादी क्रांति के लिए संघर्ष करे, भारतीय शासक वर्ग की बढ़ती निरंकुशता को हराया जा सकता है और करोड़ों मज़दूरों और युवाओं की लोकतांत्रिक और सामाजिक आकांक्षाओं की रक्षा की जा सकती है।
